केरल हाई कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण निर्णय में एक 25 वर्षीय युवक को जमानत दे दी, जिसने नए साल के जश्न के लिए पैसे देने से इनकार करने पर अपनी माँ पर हमला कर दिया था। न्यायमूर्ति पी.वी. कुण्हीकृष्णन की एकल पीठ ने इस मामले की सुनवाई करते हुए कहा,
“माँ का अपने बेटे के लिए प्यार एक गुलाब की तरह होता है – यह हमेशा खिलेगा।”
मामला कोच्चि का है, जहाँ आरोपी सम्मिल ने अपनी माँ से नए साल के जश्न के लिए पैसे मांगे। माँ के इनकार करने पर, वह घर से चला गया और थोड़ी देर बाद चाकू लेकर लौटा। उसने अपनी माँ पर हमला किया, जिससे उनके सिर, चेहरे और हाथों पर गंभीर चोटें आईं।
घटना के बाद, पुलिस ने आरोपी को 1 जनवरी 2025 को गिरफ्तार कर लिया और भारतीय न्याय संहिता (BNS), 2023 की निम्नलिखित धाराओं के तहत मामला दर्ज किया:
धारा 118(1): किसी हथियार से जानबूझकर चोट पहुंचाना
धारा 109: हत्या के प्रयास का आरोप
कोर्ट की टिप्पणी और फैसला
जब जमानत याचिका पर सुनवाई हुई, तो कोर्ट ने आज की युवा पीढ़ी की मानसिक स्थिति पर चिंता व्यक्त की।
न्यायमूर्ति पी.वी. कुण्हीकृष्णन ने कहा: “हम सिर्फ युवा पीढ़ी को दोष देने से कुछ हासिल नहीं कर सकते। माता-पिता और समाज को यह सुनिश्चित करना होगा कि वे अच्छे लोगों के संपर्क में रहें।”
कोर्ट ने यह भी कहा कि यह घटना दिखाती है कि आज के युवाओं की मानसिक स्थिति कितनी चिंताजनक हो गई है। केवल नए साल का जश्न मनाने के लिए पैसे न देने पर बेटे ने अपनी ही माँ पर हमला कर दिया, जो बेहद गंभीर मामला है।
माँ की भावनात्मक अपील और कोर्ट का मानवीय दृष्टिकोण
पहले तो कोर्ट आरोपी को जमानत देने के लिए तैयार नहीं था, क्योंकि अपराध गंभीर था। लेकिन बाद में, पीड़िता यानी माँ ने कोर्ट में एक शपथपत्र (affidavit) दाखिल किया, जिसमें उन्होंने लिखा कि वह अपने बेटे को जेल में नहीं देख सकतीं।
कोर्ट ने इस माँ की पीड़ा को समझते हुए कहा: “इस माँ के दर्द और आँसू इस याचिका में साफ झलक रहे हैं। हो सकता है कि उनके शरीर के घाव अभी भरे न हों, लेकिन उनके बेटे के प्रति उनका प्यार इन घावों से बड़ा है।”
कोर्ट ने आगे कहा कि यदि आरोपी को जेल में रखा जाता है, तो उसकी माँ को और अधिक मानसिक यातना झेलनी पड़ेगी। इसलिए, कोर्ट ने जमानत देने का फैसला किया, लेकिन सख्त शर्तों के साथ।
जमानत की शर्तें
केरल हाई कोर्ट ने यह स्पष्ट किया कि आरोपी को सख्त निगरानी में रखा जाएगा और यदि वह किसी भी शर्त का उल्लंघन करता है, तो उसकी जमानत तुरंत रद्द कर दी जाएगी।
मुख्य शर्तें:
✔ आरोपी को नियमित रूप से पुलिस स्टेशन में हाजिरी देनी होगी।
✔ माँ से किसी भी प्रकार का विवाद या संपर्क करने की कोशिश नहीं करेगा।
✔ किसी भी गैरकानूनी गतिविधि में शामिल नहीं होगा।
कानूनी विश्लेषण और निष्कर्ष
यह मामला दिखाता है कि भारतीय न्यायपालिका केवल सजा देने तक सीमित नहीं है, बल्कि समाज में सुधार लाने के लिए भी कार्य करती है।
✅ एक ओर, कोर्ट ने यह स्पष्ट किया कि माता-पिता पर हमला करना गंभीर अपराध है। ✅ दूसरी ओर, कोर्ट ने यह भी स्वीकार किया कि माता-पिता की भावनाओं और आरोपी के सुधार की संभावना को देखते हुए, उसे दूसरा मौका दिया जाना चाहिए।
न्याय का मानवीय पक्ष
न्यायमूर्ति पी.वी. कुण्हीकृष्णन की यह टिप्पणी इस फैसले की संवेदनशीलता को दर्शाती है:
“कोई भी उद्देश्य इस युवक को जेल में रखकर पूरा नहीं होगा, लेकिन उसकी माँ के दुख को बढ़ाना निश्चित होगा।”
इस मामले ने एक बार फिर यह दिखाया कि कोर्ट सिर्फ कानून की धाराओं से बंधा नहीं होता, बल्कि उसमें मानवीय भावनाओं की भी गहरी समझ होती है।
केस का संक्षिप्त विवरण:
✔ केस शीर्षक: सम्मिल बनाम केरल राज्य (BA No. 2830 of 2025) ✔ न्यायाधीश: जस्टिस पी.वी. कुण्हीकृष्णन ✔ अभियोजन पक्ष के वकील: वरिष्ठ सरकारी अभियोजक नौशाद के.ए. ✔ बचाव पक्ष के वकील: एडवोकेट गिरीश कुमार एम.एस., आकाश एस., और रिचु थेरेसा रॉबर्ट